UPNHM: एकजुटता ही हमारा कवच है, संविदा कर्मियों के अस्तित्व की लड़ाई
नमस्कार साथियों,
आज मैं आपसे एक लेखक के तौर पर नहीं, बल्कि आपके ही परिवार के एक सदस्य के रूप में बात कर रहा हूँ। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले हम एनएचएम संविदा कर्मचारी आज एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहाँ हमारा भविष्य धुंधला दिखाई दे रहा है। जिस विभाग को हमने अपने जीवन के सुनहरे वर्ष दिए, जहाँ दिन-रात एक करके प्रदेश की जनता की सेवा की, आज वहीं से हमारे लिए 'छंटनी' और 'बजट कटौती' जैसे शब्द निकलकर आ रहे हैं।
यह केवल एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की उम्मीदों पर प्रहार है जो ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।
नया पोर्टल और कटौती का 'चक्रव्यूह'
हाल ही में प्रदेश स्तर पर एनएचएम कर्मियों के लिए जो नया पोर्टल और वेतन संबंधी बदलाव लाए गए हैं, वे सुविधा से ज्यादा दुविधा पैदा कर रहे हैं। पोर्टल की तकनीकी खामियों और नए आदेशों में छिपी बजट कटौती की मंशा साफ जाहिर करती है कि सरकार अब संविदा कर्मियों के प्रति अपने उत्तरदायित्व से पल्ला झाड़ना चाहती है। लिखित आदेशों में जिस तरह से बजट में भारी कटौती और छंटनी की आशंका जताई गई है, उसने हर संविदा कर्मी के मन में असुरक्षा और शोषण की भावना भर दी है।
सोचिए, क्या यह वही 'सबका साथ-साथ विकास' है जिसका वादा किया गया था? जब पूरे देश में विकास की लहर की बात होती है, तो उत्तर प्रदेश के एनएचएम कर्मियों के हिस्से में केवल 'छंटनी' का सुझाव क्यों आता है? यह हमारे समर्पण के साथ एक भद्दा मजाक नहीं तो और क्या है?
दशकों का संघर्ष और आज की कड़वी सच्चाई
साथियों, हमने अपने अधिकारों के लिए दशकों तक संघर्ष किया है। 'अधिकार दिलाओ रैली' से लेकर अनगिनत धरनों तक, हमने हमेशा अपनी आवाज बुलंद की। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस रैली से हमें उम्मीद थी कि हमारे अधिकार सुरक्षित होंगे, उसी के बाद हमारे बचे-कुचे अधिकारों को भी छीनने की कवायद तेज हो गई है।
हमसे हमारा हक मांगने की सजा दी जा रही है। हमें बाहर का रास्ता दिखाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। यह व्यवहार न केवल दोयम दर्जे का है, बल्कि यह उन कोरोना वॉरियर्स का अपमान है जिन्होंने महामारी के दौरान अपनी जान हथेली पर रखकर काम किया था।
'बंटेंगे तो कटेंगे' – अब एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
इस संकट की घड़ी में हमें एक बहुत पुरानी और कड़वी बात याद रखनी होगी: "अगर हम अलग-अलग कैडर और यूनियनों में बंटे रहे, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे।"
आज समय अपनी व्यक्तिगत ईगो, अलग-अलग कैडर की पहचान और यूनियन की छोटी-मोटी राजनीति को भूलकर एक मंच पर आने का है। याद रखिए, सरकार की ताकत उसकी कलम में है, लेकिन हमारी ताकत हमारे 'संख्या बल' में है। अगर हम एक आवाज के नीचे संगठित नहीं हुए, तो बारी-बारी से सबका शोषण होगा।
युद्ध का चक्रव्यूह रचा जा चुका है और शत्रु हमारे सामने है। अब हमें यह तय करना है कि क्या हम इस अन्यायपूर्ण हार को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे या फिर अपने वजूद के लिए एक बड़ा युद्ध लड़ेंगे?
प्रदेश कमेटी और हमारे नेतृत्व पर भरोसा
साथियों, आगे का रास्ता कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। हमें पूरी तरह से अनुशासित रहकर अपनी प्रदेश कमेटी और प्रदेश अध्यक्ष के निर्देशों का पालन करना है। जब तक नेतृत्व की ओर से आह्वान न हो, हमें संगठित रहना है और जैसे ही रणभेरी बजे, हमें पूरी ताकत के साथ अपनी आवाज उठानी है।
हमें यह साबित करना होगा कि हम केवल 'संविदा' पर रखे गए कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि हम इस प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की आत्मा हैं। अगर आत्मा को चोट पहुँचेगी, तो शरीर कभी स्वस्थ नहीं रह सकता।
हमारा संकल्प
हम कभी हारे नहीं हैं और न ही हारेंगे। यह लड़ाई सिर्फ तनख्वाह की नहीं है, यह लड़ाई हमारे सम्मान की है, हमारे बच्चों के भविष्य की है और हमारी पहचान की है।
अंत में, मैं बस इतना ही कहूँगा कि अपनी एकता की मुट्ठी को कस लीजिए। किसी भी बहकावे में न आएं और न ही डरें। जो डरेगा, वही मरेगा। जो लड़ेगा, वही जीतेगा।
हम सब एक हैं!
यूपी एनएचएम संविदा कर्मचारी संघ - जिंदाबाद!
यूपी एनएचएम संविदा कर्मचारी संघ - जिंदाबाद!

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