MP Outsource Employees Big Update: मार्च 2027 तक आउटसोर्स व्यवस्था होगी समाप्त, सरकार का बड़ा फैसला
नमस्ते दोस्तों!
मध्य प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से एक ऐसी खबर निकलकर सामने आ रही है, जिसने प्रदेश के लाखों घरों के चूल्हे और भविष्य की चिंता को बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव कैबिनेट के एक ताजा फैसले के बाद वित्त विभाग ने एक ऐसा आदेश जारी किया है, जो आने वाले समय में मध्य प्रदेश की कार्यप्रणाली और रोजगार के ढांचे को पूरी तरह बदल कर रख देगा।
आज के इस ब्लॉग में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि आखिर सरकार का वह कौन सा आदेश है जिसने प्रदेश के 3 लाख से ज्यादा परिवारों की धड़कनें बढ़ा दी हैं और क्यों इस फैसले के बाद प्रदेश में विरोध की लहर उठने लगी है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी विभागों में कर्मचारियों की श्रेणियों को लेकर एक बड़ा नीतिगत बदलाव किया है। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि विभागों में भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और श्रेणियों का वर्गीकरण स्पष्ट हो। इसे अमलीजामा पहनाते हुए वित्त विभाग ने नया आदेश जारी किया है।
इस आदेश के तहत राज्य सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों को अब निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:
- नियमित (Regular)
- अस्थायी (Temporary)
- संविदा (Contractual)
- कार्यभारित (Work Charged)
- आकस्मिकता निधि (Contingency Fund)
- अंशकालिक (Part-time)
लेकिन इस पूरी लिस्ट में जिस श्रेणी का नाम गायब है या जिसे खत्म करने की बात कही गई है, वह है— 'आउटसोर्स श्रेणी'। सरकार ने तय किया है कि अब आउटसोर्सिंग के माध्यम से भर्ती की प्रक्रिया को पूरी तरह बंद किया जाएगा और जो वर्तमान में कार्यरत हैं, उनके लिए भी एक समय सीमा तय कर दी गई है।
मार्च 2027: आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए 'डेडलाइन'
इस आदेश का सबसे कड़ा और विवादित हिस्सा वह है, जिसमें आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाओं को समाप्त करने का जिक्र है। सरकार की योजना के अनुसार:
- श्रेणी का खात्मा: आउटसोर्स कर्मचारी श्रेणी को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा।
- समय सीमा: चरणबद्ध तरीके से मार्च 2027 तक सभी आउटसोर्स सेवाओं को समाप्त करने की तैयारी है।
- पद का अस्तित्व: आदेश में स्पष्ट किया गया है कि आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए कोई भी सरकारी पद 'सृजित' (Created) नहीं माना जाएगा। उनकी नियुक्ति निजी एजेंसियों के माध्यम से होती है, इसलिए सरकार उन्हें अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर रही है।
- नियमित भर्ती पर जोर: सरकार का कहना है कि भविष्य में अगर काम की आवश्यकता होती है, तो आउटसोर्स के बजाय केवल नियमित कर्मचारियों की ही भर्ती की जाएगी।
लाखों परिवारों पर संकट के बादल
दोस्तों, आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश के विभिन्न विभागों—जैसे बिजली विभाग, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग और नगर निगमों—में 3 लाख से भी अधिक आउटसोर्स कर्मचारी और अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें से कई कर्मचारी पिछले 10-15 वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि प्रदेश के अधिकतर विभागों में ये आउटसोर्स कर्मचारी नियमित (Regular) पदों के विरुद्ध ही काम कर रहे हैं। यानी काम वही है जो एक नियमित कर्मचारी करता है, लेकिन दर्जा 'आउटसोर्स' का है। अब अचानक 2027 तक का अल्टीमेटम मिलने से इन कर्मचारियों के सामने अपनी आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। उन्हें डर है कि मार्च 2027 के बाद वे सड़क पर आ जाएंगे।
खलबली और विरोध के सुर
जैसे ही वित्त विभाग का यह आदेश सोशल मीडिया और समाचारों में फैला, वैसे ही कर्मचारियों के बीच भारी आक्रोश देखने को मिला। विभिन्न कर्मचारी संगठनों और आउटसोर्स अधिकारी-कर्मचारी संघों ने इस फैसले को 'अमानवीय' करार दिया है।
कर्मचारियों के विरोध के मुख्य कारण:
- भविष्य की अनिश्चितता: जो लोग अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा सरकारी सेवा में दे चुके हैं, वे अब इस उम्र में कहां जाएंगे?
- भर्ती प्रक्रिया का प्रभाव: नियमित भर्ती होने में समय लगता है। तब तक विभागों का काम कैसे चलेगा?
- एजेंसियों का शोषण: कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार उन्हें सीधे अपने संरक्षण में लेने के बजाय बाहर का रास्ता दिखा रही है।
कर्मचारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस फैसले को वापस नहीं लिया या आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोई बीच का रास्ता (जैसे संविदा में विलय) नहीं निकाला, तो पूरे प्रदेश में उग्र आंदोलन किया जाएगा। राजधानी भोपाल में बड़े प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
सरकार का पक्ष और प्रशासनिक तर्क
सरकार के करीबी सूत्रों और प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि यह फैसला शासन व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए लिया गया है। 'आउटसोर्सिंग' मॉडल में अक्सर भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी की शिकायतें आती थीं। सरकार चाहती है कि विभागों में जवाबदेही बढ़े और एक स्पष्ट 'कैडर' प्रणाली हो। सरकार का मानना है कि मार्च 2027 तक का समय पर्याप्त है जिसमें व्यवस्था को नियमित भर्तियों के माध्यम से सुधारा जा सकता है।
एक मानवीय दृष्टिकोण: आगे क्या?
एक ब्लॉग लेखक के तौर पर जब मैं इस स्थिति को देखता हूं, तो यह केवल एक 'आदेश' नहीं बल्कि 3 लाख जिंदगियों का सवाल लगता है। क्या सरकार इन कर्मचारियों को नियमित पदों पर प्राथमिकता देगी? क्या उनके अनुभव का सम्मान करते हुए उन्हें संविदा या अन्य श्रेणियों में समायोजित किया जाएगा?
यह सच है कि सिस्टम में सुधार जरूरी है, लेकिन सुधार की कीमत उन लोगों को नहीं चुकानी चाहिए जिन्होंने मुश्किल समय में (जैसे कोरोना काल के दौरान) अपनी जान जोखिम में डालकर सरकार का साथ दिया।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश सरकार का यह फैसला आने वाले दिनों में एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनने वाला है। एक तरफ प्रशासनिक सुधार की दलील है, तो दूसरी तरफ लाखों कर्मचारियों का भविष्य। मार्च 2027 की तारीख अब उन 3 लाख कर्मचारियों के लिए किसी 'काले साये' से कम नहीं है।अब देखना यह होगा कि क्या मोहन यादव सरकार अपने इस फैसले पर अडिग रहती है या कर्मचारियों के आक्रोश को देखते हुए इसमें कोई संशोधन किया जाता है।
दोस्तों, इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि आउटसोर्सिंग को खत्म करना सही फैसला है? या सरकार को इन कर्मचारियों के लिए कोई स्थायी नीति बनानी चाहिए थी?
अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और इस जानकारी को अपने साथियों के साथ शेयर करें।
धन्यवाद!
Disclaimer
यह लेख विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध सरकारी सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी समय के साथ बदल सकती है। किसी भी आधिकारिक निर्णय, नियुक्ति या सेवा शर्तों से संबंधित अंतिम और प्रमाणिक जानकारी के लिए संबंधित विभाग या सरकार की आधिकारिक वेबसाइट/नोटिफिकेशन अवश्य देखें। लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रकार की त्रुटि या नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगी।
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